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বৃহস্পতিবার, ২৫ জুলাই ২০২৪, ১০:৫৭ অপরাহ্ন

ভয়াবহ বন্যার আশঙ্কা

রিপোর্টার
  • আপডেট : বৃহস্পতিবার, ২৭ জুন, ২০২৪
  • ৫০ দেখা হয়েছে
সিলেট অঞ্চলে বন্যা শেষ হতে না হতে আবারও দেশজুড়ে প্রবল বন্যার আশঙ্কা করা হচ্ছে। জলবায়ু পরিবর্তন ও বৈশ্বিক উষ্ণতা বৃদ্ধি পাওয়ায় এবং স্বাভাবিক বর্ষাকালে মৌসুমি বায়ু সক্রিয় থাকায় ভারী বৃষ্টির কারণেই জুলাই মাসে দেশে বন্যা পরিস্থিতি ‘ভয়াবহ’ রূপ নিতে পারে। বিশেষ করে দেশের উত্তরাঞ্চল (রংপুর, কুড়িগ্রাম, লালমনিরহাট ও নীলফামারী), উত্তর মধ্যাঞ্চল (যমুনা নদী-তীরবর্তী এলাকার টাঙ্গাইল, মানিকগঞ্জ ও জামালপুর) এবং উত্তর পশ্চিমাঞ্চলে (বগুড়া, গাইবান্ধা, সিরাজগঞ্জ ও পাবনা জেলা) বড় ধরনের বন্যার আশঙ্কার তথ্য জানিয়েছেন বন্যা পূর্বাভাস ও সতর্কীকরণ কেন্দ্রের কর্মকর্তা ও পানি বিশেষজ্ঞরা।
তারা বলছেন, জলবায়ুজনিত কয়েকটি চক্র রয়েছে। যেমন এল নিনো চক্র ও লা নিনো চক্র। এল নিনো পর্যায় হলো শুষ্ক মৌসুম যখন স্বাভাবিকের চেয়ে বৃষ্টি কমে যায় আর বন্যাও কম হয় ও তাপমাত্রা অত্যধিক বৃদ্ধি পায়। এ ছাড়া প্রশান্ত মহাসাগরীয় নিরক্ষরেখার চারপাশে পানি উষ্ণ হতে থাকে। এ সময় পূর্ব দিকের বাণিজ্য বায়ু দুর্বল হয়ে পড়ে। আর লা নিনা চক্রের সময়ে বৃষ্টি ও বন্যা বেশি হয়। পূর্বদিকের বাণিজ্য বায়ু শক্তিশালী হতে শুরু করে। বৃষ্টির সঙ্গে ‘মেডেন জুলিয়ান ওসিলেশন’-এর (গ্রীষ্মমণ্ডলীয় আবহাওয়ার ওঠানামা) সম্পর্ক আছে। বর্তমানে তা দুর্বল অবস্থায় আছে। জুলাই মাসে এটি সক্রিয় হবে। তখন এটি ভারত মহাসাগরের ওপরে অবস্থান করবে। এতে বঙ্গোপসাগরে প্রচণ্ড মেঘ ও জলীয়বাষ্প তৈরি হবে। তখন বাতাস এ মেঘের পুরোটাই বাংলাদেশের দিকে নিয়ে আসে। তখনই মেঘালয় ও আসামে আবার ভারী বৃষ্টি শুরু হবে। এ সময় বর্ষণ বেড়ে গিয়ে বন্যা পরিস্থিতির সৃষ্টি হতে পারে। তবে এই বন্যা কতটা দীর্ঘস্থায়ী হবে তা নির্ভর করবে কতটুকু ভারী বৃষ্টি হবে, এর মাত্রা কেমন এবং কতদিন অব্যাহত থাকবে তার ওপর। আবার পদ্মা-ব্রহ্মপুত্রের পানি একসঙ্গে বাড়লেও বড় বন্যা হতে পারে।
গবেষকরা বলছেন, দেশে যখনই বন্যা হয় তখনই মানুষের মৃত্যু থেকে শুরু করে রাস্তাঘাট, স্থাপনা ও ফসলের ব্যাপক ক্ষয়ক্ষতি হয়। প্রতি বছর কোটি কোটির টাকার ক্ষয়ক্ষতি হয়। বন্যাকবলিত এলাকায় লাখ লাখ মানুষ পানিবন্দি হয়ে ঘরবাড়ি ছাড়া হয়ে মানবেতর জীবনযাপন করে। সিলেটের ক্ষেত্রেও তা দেখা গেছে। এ অবস্থায় আবার বন্যা হলে প্রস্তুতি কতটুকু তা নিয়ে সংশয় প্রকাশ করেন তারা।

তাই কোন অঞ্চল বেশি বন্যার শিকার হচ্ছে, কোন কোন অঞ্চলে কম হচ্ছে, এসব ভেবে সেই অনুযায়ী আগে থেকে নদী বিশেষজ্ঞ দ্বারা সুপরিকল্পিত পরিকল্পনা করতে হবে। আর যেহেতু দেশে বন্যার বড় কারণ হলো নদীগুলোর পানি ধারণক্ষমতা কম। যে কারণে ভারতের পানি আসার সঙ্গে সঙ্গে চারদিক প্লাবিত হয়। বিভিন্নভাবে নদীগুলো প্রকৃত রূপ হারানোর ফলে নাব্য বাধাগ্রস্ত হচ্ছে। বর্ষা মৌসুমে ভারী বর্ষণ হলে পানিপ্রবাহ কমে যাওয়ায় নিম্নাঞ্চল বন্যায় প্লাবিত হয়। তাই বন্যা নিয়ন্ত্রণের জন্য বাঁধ নির্মাণের পরিকল্পনা গ্রহণ ও বাস্তবায়ন এবং ভরাট নদীগুলো পুনঃখনন করা জরুরি হয়ে পড়ছে বলেও মনে করেন তারা।
বাংলাদেশ পানি উন্নয়ন বোর্ডের (বাপাউবো) বন্যা পূর্বাভাস ও সতর্কীকরণ কেন্দ্রের নির্বাহী প্রকৌশলী সরদার উদয় রায়হান সময়ের আলোকে বলেন, স্বাভাবিক সময়ের চেয়ে আগামী জুলাই মাসে বেশি এবং ভারী বৃষ্টি হওয়ার আশঙ্কা রয়েছে। ফলে পানি বাড়তে পারে এবং বিপদসীমার বাইরে গিয়ে জুলাইয়ের প্রথম সপ্তাহের দিকে বড় ধরনের বন্যার আশঙ্কা করছি আমরা। ওই সময়ে দেশের প্রধান নদ-নদীর পানি বাড়তে পারে এবং কিছু এলাকায় বিপদসীমার বাইরে যেতে পারে। স্বাভাবিক বর্ষা মৌসুমে বন্যা প্রতি বছরই হয়। যদিও এখন পর্যন্ত আবহাওয়ার যে পূর্বাভাস তাতে গুরুতর বন্যার আশঙ্কা কম।
তিনি বলেন, স্বাভাবিক যে এরিয়াগুলো রয়েছে তার যে চ্যানেল বা পানি প্রবেশের যে পথগুলো রয়েছে তা যদি ব্লক হয়ে যায় তা হলে পানি বহন বা ধারণ করার ক্ষমতা বিঘ্নিত হয়। যেহেতু এখন বর্ষা মৌসুম চলছে। অনেক স্থানে বৃষ্টি হচ্ছে। এটি জুলাই মাসে উচ্চমানে পৌঁছাতে পারে। বর্ষাকালে বৃষ্টির পরিমাণ বেশি হতে পারে। তাই বলা যেতে পারে মৌসুমি বন্যার ঝুঁকি রয়েছে। বিশেষ করে দেশের উত্তরাঞ্চলে বন্যার আশঙ্কা রয়েছে।
বন্যার আগাম প্রস্তুতি সম্পর্কে সরদার উদয় রায়হান বলেন, বন্যা মোকাবিলায় আমরা আগাম সতর্কতা থেকে শুরু করে নানা ধরনের প্রস্তুতি নিয়ে থাকি। যেমন আমরা তথ্য পাওয়ার সঙ্গে সঙ্গে জাতীয় পর্যায় এবং মাঠ পর্যায়ে দফতরগুলোকে সতর্কবার্তা দিয়ে থাকি। সার্বক্ষণিকভাবে বাঁধ রক্ষণাবেক্ষণ মনিটরিং করা হয়ে থাকে এবং জরুরি ভিত্তিতে মেরামত কাজ করা হয়। জেলা প্রশাসন এবং দুর্যোগ ব্যবস্থাপনা মন্ত্রণালয়ের সঙ্গে সমন্বয় করে ক্ষতিগ্রস্ত মানুষদের পুনর্বাসনের জন্য সহায়তা করা হয়ে থাকে।
এ ব্যাপারে বাপাউবোর উপ-বিভাগীয় প্রকৌশলী সজল কুমার রায় সময়ের আলোকে বলেন, উত্তর পূর্বাঞ্চল যেমন সিলেট সুনামগঞ্জসহ বেশ কিছু এলাকায় খুব অল্প সময়ে বেশি পরিমাণে বৃষ্টির কারণে একটা বন্যা হয়ে গেছে। কিন্তু এখন যেহেতু বর্ষা মৌসুম বা মৌসুমি বায়ুর প্রভাব চলছে, তাই এখন দেশের ৫টি স্টেশনের নদ-নদীর পানি বিপদসীমার ওপর দিয়ে প্রবাহিত হচ্ছে। এই সময়ে সচরাচর বৃষ্টি সবসময় থাকে। তবে বৃষ্টি কোন অঞ্চলে হবে এবং কতটুকু ভারী বৃষ্টি হবে তার মাত্রা কেমন এবং কতদিন অব্যাহত থাকবে তার ওপর নির্ভর করছে বন্যা পরিস্থিতি। আবার বৃষ্টি হলেই যে বন্যা হবে বিষয়টি এমন না।
সাধারণত বন্যা হওয়ার পেছনে বেশ কিছু বিষয় জড়িত এবং অনেক কারণ থাকে। যেমন একই অঞ্চলজুড়ে একাধিক সময়ে ধারাবাহিকভাবে ভারী বৃষ্টি হলেই বন্যা দেখা দেয়। এ ছাড়া নদীর পানি তো সাধারণত উজান থেকে ভাটির দিকে নামে। বৃষ্টি হলেও নামবে আবার না হলেও নামবে। এখন যেহেতু মৌসুমি বায়ু সক্রিয় রয়েছে তাই ধারাবাহিকভাবে বৃষ্টি হবে। কোন অঞ্চলে কতটুকু হবে তার ওপর বন্যা পরিস্থিতি নির্ভর করছে। এ বিষয়ে আবহাওয়া অধিদফতর ভালো বলতে পারবে। এই বন্যা দীর্ঘস্থায়ী হবে না কি স্বল্পমেয়াদি হবে তা এই মুহূর্তে বলা সম্ভব হচ্ছে না।
দেশে বার বার বন্যার কারণ হিসেবে বাংলাদেশ প্রকৌশল বিশ্ববিদ্যালয়ের (বুয়েট) পানি ও বন্যা ব্যবস্থাপনা ইনস্টিটিউটের ড. অধ্যাপক একেএম সাইফুল ইসলাম সময়ের আলোকে বলেন, মৌসুমি জলবায়ুর প্রভাবে, আকস্মিক পাহাড়ি ঢলে, নিষ্কাশন ব্যবস্থাজনিত এবং সমুদ্র-তীরবর্তী অঞ্চলে ঝড়-সৃষ্ট জলোচ্ছ্বাসজনিত কারণে বন্যা হতে পারে।
তিনি বলেন, বৈশ্বি ক উষ্ণতা বৃদ্ধিতে আবহাওয়া-জলবায়ু বা বৃষ্টির ধরন বদলে গেছে। খরা হলে প্রচণ্ড খরা আবার বৃষ্টি হলে অতি বৃষ্টিÑএ নিয়ে প্রকৃতি বিরূপ প্রতিক্রিয়া দেখাচ্ছে। আবার এখন বৃষ্টি হলে অনেক বেশি গভীর বৃষ্টি হয়। উজান থেকে নেমে আসা অতিবৃষ্টির পানি ধরে রাখতে ও পরিবহন করতে হাওর ও নদী গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করে। কিন্তু ক্রমাগত অপরিকল্পিত উন্নয়নসহ নদী-হাওর ও বিল দখল ও ভরাট হয়ে যাচ্ছে। নদীর নাব্য সংকট, অপরিকল্পিত বাঁধ নির্মাণ, জমি ভরাট ও পূর্ব-পশ্চিমে আড়াআড়ি মহাসড়কই পানিপ্রবাহে মূল বাধা হয়ে দাঁড়ায়। ফলে অতিবৃষ্টিতে চরম জলাবদ্ধতা দেখা দেয়। তাই বন্যার নতুন ধরনের কারণে দীর্ঘ মেয়াদে আমাদের পরিকল্পনা গ্রহণ করতে হবে। নদী খনন ছাড়াও জলাভূমি সংরক্ষণের ব্যবস্থা করতে হবে। সমন্বিত ও দীর্ঘ মেয়াদি প্লার্নিং করে বাঁধ নির্মাণ করতে হবে নইলে প্রতি বছরেই বন্যা হবে।
অন্যদিকে পরিকল্পিত উন্নয়নের মাধ্যমে বন্যা ব্যবস্থাপনা করা সম্ভব। এতে মানুষের দুর্ভোগ কমবে বলেও মনে করেন পানিসম্পদ ব্যবস্থাপনা এবং জলবায়ু পরিবর্তন বিশেষজ্ঞ ইমেরিটাস অধ্যাপক ড. আইনুন নিশাত।
তিনি সময়ের আলোকে বলেন, প্রকৃতি বদলাচ্ছে। আমাদের অবশ্যই প্রকৃতিকে বুঝতে হবে। বাংলাদেশের সিলেট বিভাগে বৃষ্টি বেশি হওয়ায় এবং ভারতের মেঘালয় ও আসামে বেশি বৃষ্টি হওয়ায় সিলেট ও সুনামগঞ্জের বাসিন্দারা বন্যায় আক্রান্ত হয়েছেন। এ ছাড়াও সিলেট ও সুনামগঞ্জে শহররক্ষা বাঁধ নেই। ফলে বছরে তিন-চার বার এবং প্রতি বছর বন্যা হওয়াটা অস্বাভবিক কিছু না। সেখানে কার্যকর বাঁধ থাকলে বন্যায় মানুষ আক্রান্ত হতো না। আর দেশের বেশিরভাগ এলাকায় মাটি দিয়ে বাঁধ তৈরি করায় অনেক ক্ষেত্রে তা টিকে না।
তিনি বলেন, দেশে জুন মাস থেকে সেপ্টেম্বর মাস পর্যন্ত যে কোনো সময় বন্যা হতে পারে-যদি উজানে ও মেঘালয়ে বেশি বৃষ্টি হয়। আর তখন উজানের পানি নেমে আসবে। আমাদের বৃষ্টির দেশে যে বৃষ্টি হবে তা নদীতে গড়াবে। ধারণক্ষমতার চেয়ে পানি বেশি হওয়ায় লোকালয় প্লাবিত হবে। কিন্তু সিলেটের বন্যা আর গাইবান্ধার বন্যা কখনই এক হবে না। সিলেটের পানি দ্রুত নেমে যাচ্ছে। কিন্তু গাইবান্ধা বা বগুড়ার পানি সহজে নামবে না। বিশেষ করে আমাদের উজানে ভারতের মেঘালয়ে একদিনে ভারী বৃষ্টির ঘটনা ঘটলেই বন্যা পরিস্থিতি সৃষ্টি হয়। কারণ আমাদের উত্তর-পূর্বাঞ্চলের নদীব্যবস্থা এত স্বল্প সময়ে বিপুল পরিমাণ পানি পরিবহন করতে পারে না।
ড. আইনুন নিশাত বলেন, আমি বন্যা মোকাবিলায় রিলিফ দেওয়া, খাবার দেওয়া, চাল, ডাল ও খিচুড়ি দেওয়ার পক্ষে নই। বন্যা থেকে পরিত্রাণ পেতে শুধু নদী ড্রেজিং করে খুব একটা সুফল পাওয়া যাবে না। এ জন্য উজানে ড্যাম নির্মাণ করতে হবে।

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